My Book :- Aashiqi
Written By :- Vivek kumar (9871358954)
I inspired for this poetry & Book :- Dear Komal ( W.G.Tech Computer)
Poetry :- दिल की जमी
मेरे दिल की जमीं पर, मिट्टी कुछ ऐसी है
फसल उगते हैं जख्मों के, नमी कुछ इसकी ऐसी है
बीज गिरते हैं, खुशियों के, पौधे बन बाहर आते हैं
पता लगता है, कुछ मिनटों में, पौधों को कीड़े खाते हैं
दवा छिड़काव करू तो मैं, असर फिर भी न कुछ होता
बार - बार मैं रखू ख्याल, सौ मिनटों में सौ - सौ बार
नीर बुलंदी कि होती हैं।
मेरे दिल की जमीं पर, मिट्टी कुछ ऐसी होती हैं
फ़सल उगते हैं, जख्मों के नमी कुछ ऐसी होती हैं।
कुछ महीनों के उपरांत, सोचू आयेगी खुशियां अब
हसु और जागु कई - कई रात, होती है जब वो काली भोर
पता चलता है यारा तब, सिचा था तुने जिस - जिस को
उसमे काटा ही काटा हैं, फ़सल तो ये नहीं पागल
उसे तो ले गया कोई और, नज़्म लिखता रहा विवेक
दिल कोमल था उसका यार, अभी तक खत्म हुआ ना दौर
मेरे दिल की जमीं पर ..........
Please don't use without my permission
Written By :- Vivek kumar (9871358954)
I inspired for this poetry & Book :- Dear Komal ( W.G.Tech Computer)
Poetry :- दिल की जमी
मेरे दिल की जमीं पर, मिट्टी कुछ ऐसी है
फसल उगते हैं जख्मों के, नमी कुछ इसकी ऐसी है
बीज गिरते हैं, खुशियों के, पौधे बन बाहर आते हैं
पता लगता है, कुछ मिनटों में, पौधों को कीड़े खाते हैं
दवा छिड़काव करू तो मैं, असर फिर भी न कुछ होता
बार - बार मैं रखू ख्याल, सौ मिनटों में सौ - सौ बार
नीर बुलंदी कि होती हैं।
मेरे दिल की जमीं पर, मिट्टी कुछ ऐसी होती हैं
फ़सल उगते हैं, जख्मों के नमी कुछ ऐसी होती हैं।
कुछ महीनों के उपरांत, सोचू आयेगी खुशियां अब
हसु और जागु कई - कई रात, होती है जब वो काली भोर
पता चलता है यारा तब, सिचा था तुने जिस - जिस को
उसमे काटा ही काटा हैं, फ़सल तो ये नहीं पागल
उसे तो ले गया कोई और, नज़्म लिखता रहा विवेक
दिल कोमल था उसका यार, अभी तक खत्म हुआ ना दौर
मेरे दिल की जमीं पर ..........
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