Monday, 30 December 2019

एकबार में ही मेरी गलती की जी-भर के सज़ा क्यों नहीं देते

My Book :- Aashiqui
Poetry No :- 2
Written By :- Vivek Kumar (9871358954)
I Inspired :-  Dear Komal (No Face only Earing)
For Spl. :- Dear Komal (W.G.Tech Computer)
Poetry :- एकबार में ही मेरी गलती की जी-भर के सज़ा क्यों नहीं देते
आदत सी हो गई है अब ,तेरे बिन राहा नहीं जाता
दे दो जहर जुदाई का गम ,अब साहा नहीं जाता
एक काम करो सनम मुझे मार क्यों नहीं देते
एकबार में ही मेरी गलती की जी-भर के सज़ा क्यों नहीं देते।
पत्थर हूं अगर, तेरे राहों में तो मुझे हटा क्यों नही देते
चलो मान लिया, कि तुम मुझसे नफरत नहीं करते
मगर पहले की तरह प्यार भी नहीं करते
ख़त आज भी महफूज़ रखे हैं हमने
पढ़ लेना क्यू पहले कि तरह इजहारे- इश्क़ नहीं करते।
प्यार करना जुर्म है, तो ये खता हमसे हुई
फैसले जो भी मुनासिब हो वो सुना क्यू नहीं देते
एकबार में ही मेरी गलती की जी-भर के सज़ा क्यों नहीं देते।
ऐसा मुझे क्यू लगता है ......(1)
की तुम बदले- बदले से नज़र आ रहे हो
कहीं, ऐसा तो नहीं कि किसी और की गली जा रहे हो
अपने चाहने वालों को अंधेरे में रखना कहां तक उचित है
किसी और को चाहने लगे हों तो क्यू छुपा रहे हो
जाने- जिंदगी कर दी मैंने कब की तेरे नाम से
दुश्मन हू तो फिर  हाथों से मिटा क्यू नही देते
एकबार में ही मेरी गलती की जी-भर के सज़ा क्यों नहीं देते।
याहा मोहब्बत का शौख किसे था, तुम पास आती गई
और मोहब्बत होती गई
मैं भी प्रेम के धागे बुनता गया....(1)
और तुम भी पागल सी, उसमे मोती पिरोती गई
इस तरह नज़रे तुम हमसे क्यू चुराते हो विवेक
फ़िदा किसी और पे हो तो बता क्यू नही देते
एकबार में ही मेरी गलती की जी-भर के सज़ा क्यों नहीं देते।

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Poetry :- मैने रखा है

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